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sahir ludhianavi(સાહિર લુધીયાનવી)

जन्म:- 08 मार्च 1921

निधन:- 25 अक्तूबर 1980

उपनाम:- साहिर

जन्म स्थान :-लुधियाना, पंजाब, भारत

कुछ प्रमुख कृतियाँ :-तल्ख़ियाँ, परछाईयाँ

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कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी

अजब न था के मैं बेगाना-ए-अलम रह कर
तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता
तेरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आँखें
इन्हीं हसीन फ़सानों में महव हो रहता

पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की
तेरे लबों से हलावट के घूँट पी लेता
हयात चीखती फिरती बरहना-सर, और मैं
घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुप के जी लेता

मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
के तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं

ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रह्गुज़ारों से
महीब साये मेरी सम्त बढ़ते आते हैं
हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ारज़ारों से

न कोई जादह-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िन्दगी मेरी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खोकर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स मगर फिर भी

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

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ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उलफत ही सही
तुम को इस वादी-ए-रँगीं से अक़ीदत ही सही
मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे

बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी
सब्त जिस राह पे हों सतवत-ए-शाही के निशाँ
उस पे उलफत भरी रूहों का सफर क्या मानी

मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तशरीर-ए-वफ़ा
तूने सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली,
अपने तारीक़ मक़ानों को तो देखा होता

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उनके
लेकिन उनके लिये तश्शीर का सामान नहीं
क्यूँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे

ये इमारत-ओ-मक़ाबिर, ये फ़ासिले, ये हिसार
मुतल-क़ुलहुक्म शहँशाहों की अज़्मत के सुतून
दामन-ए-दहर पे उस रँग की गुलकारी है
जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अजदाद का ख़ून

मेरी महबूब! उनहें भी तो मुहब्बत होगी
जिनकी सानाई ने बक़शी है इसे शक़्ल-ए-जमील
उनके प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नमूद
आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़ँदील

ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा, ये महल
ये मुनक़्कश दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहँशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़
मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे

साहिर लुधियानवी

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क्या मिलिए ऎसे लोगों से, जिनकी फितरत छुपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।

खुद से भी जो खुद को छुपाए, क्या उनसे पहचान करें
क्या उनके दामन से लिपटें, क्या उनका अरमान करें
जिनकी आधी नीयत उभरे, आधी नीयत छुपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।

दिलदारी का ढोंग रचाकर, जाल बिछाएं बातों का
जीते-जी का रिश्ता कहकर सुख ढूंढे कुछ रातों का
रूह की हसरत लब पर आए, जिस्म की हसरत छुपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।

जिनके जुल्म से दुखी है जनता हर बस्ती हर गाँव में
दया धरम की बात करें वो, बैठ के सजी सभाओं में
दान का चर्चा घर-घर पहुंचे, लूट की दौलत छुपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।

देखें इन नकली चेहरों की कब तक जय-जयकार चले
उजले कपड़ों की तह में, कब तक काला संसार चले
कब तक लोगों की नजरों से, छुपी हकीकत चुपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।

क्या मिलिए ऎसे लोगों से, जिनकी फितरत छुपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।

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चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों ।

न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की,

न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत अन्दाज़ नज़रों से ।

न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से,

न ज़ाहिर हो तुम्हारी कशमकश का राज़ नज़रों से ॥

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशक़दमी से,

मुझे भी लोग कहते हैं ये जलवे पराए हैं ।

मेरे हमराह भी रुसवाइयाँ हैं मेरे माज़ी की,

तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं ॥

तारुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर,

ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा ।

वो अफ़साना जिसे अन्जाम तक लाना न हो मुमकिन,

उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ॥

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जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग

एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग

याद रहता है किसे गुज़रे ज़माने का चलन

सर्द पड़ जाती है चाहत हार जाती है लगन

अब मौहब्बत भी है क्या एक तिजारत के सिवा

हम ही नादान थे जो ओढ़ा बीती यादों का कफ़न

वरना जीने के लिए सब कुछ भुला लेते हैं लोग

जाने वो क्या लोग थे जिनको वफ़ा का पास था

दूसरे के दिल पे क्या गुज़रेगी यह अहसास था
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कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया ।
बात निकली तो हर एक बात पे रोना आया ॥

हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को ।
क्या हुआ आज, यह किस बात पे रोना आया ?

किस लिए जीते हैं हम, किसके लिए जीते हैं ?
बारहा ऎसे सवालात पे रोना आया ॥

कौन रोता है किसी और की ख़ातिर, ऎ दोस्त !
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया ॥

अब हैं पत्थर केसनम जिनको एहसास न ग़म

वो ज़माना अब कहाँ जो अहले दिल को रास था

अब तो मतलब के लिए नाम-ए-वफ़ा लेते हैं लोग

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ज़िन्दगी-भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात

एक अन्जान हसीना से मुलाक़ात की रात

हाय ! वह रेशमी जुल्फ़ों से बरसता पानी

फूल-से गालों पे रुकने को तरसता पानी

दिल में तूफ़ान उठाए हुए जज़्बात की रात

ज़िन्दगी-भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात

डर के बिजली से अचानक वह लिपटना उसका

और फिर शर्म से बल खाके सिमटना उसका

कभी देखी न सुनी ऎसी तिलिस्मात की रात

ज़िन्दगी-भर नहीं भूलेगी बरसात की रात
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जाने वो कैसे लोग थे, जिनके प्यार को प्यार मिला ?
हमने तो जब कलियाँ मांगीं, काँटों का हार मिला ॥

खुशियों की मंज़िल ढूंढी तो ग़म की गर्द मिली
चाहत के नग़में चाहे तो आहें सर्द मिलीं
दिल के बोझ को दूना कर गया, जो ग़म्ख़्वार मिला

बिछड़ गया हर साथी दे कर, पल-दो-पल का साथ
किसको फ़ुरसत है जो थामे, दीवानों का हाथ
हम को अपना साया तक अक्सर बेज़ार मिला

इसको ही जीना कहते हैं तो यूँ ही जी लेंगे
उफ़ न करेंगे, लब सीलेंगे, आँसू पी लेंगे
ग़म से अब घबराना कैसा, ग़म सौ बार मिला

जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला ?

सुर्ख़ आँचल को दबा कर जो निचोड़ा उसने

दिल पर जलता हुआ एक तीर-सा छोड़ा उसने

आग पानी में लगाते हुए हालात की रात

ज़िन्दगी-भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात

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जो बात तुझ में है, तेरी तस्वीर में नहीं

रंगों में तेरा अक्स ढला, तू न ढल सकी

साँसों की आग, जिस्म की ख़ुशबू न ढल सकी

तुझ में जो लोच है, मेरी तहरीर में नहीं

बेजान हुस्न में कहाँ गुफ़तार की अदा

इन्कार की अदा है न इक़रार की अदा

कोई लचक भी जुल्फ़े गिरहगीर र्में नहीं

दुनिया में कोई चीज़ नहीं है तेरी तरह

फिर एक बार सामने आ जा किसी तरह

क्या एक और झलक, मेरी तक़दीर में नहीं ?

जो बात तुझ में है, तेरी तस्वीर में नहीं

मेरे नग़मों में जो बसती है वो तस्वीर थी वो

नौजवानी के हसीं ख़्वाब की ताबीर थी वो

आसमानों से उतर आई थी जो रात की रात

ज़िन्दगी-भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात

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तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले

अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले

डरता है ज़माने की निगाहों से भला क्यों

इन्साफ़ तेरे साथ है इल्ज़ाम उठा ले

क्या ख़ाक वो जीना है जो अपने ही लिए हो

ख़ुद मिट के किसी और को मिटने से बचा ले

टूटे हुए पतवार हैं किश्ती के तो ग़म क्या

हारी हुई बाहों को ही पतवार बना ले

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तुम न जाने किस जहाँ में खो गए

हम भरी दुनिया में तनहा हो गए

मौत भी आती नहीं, आस भी जाती नहीं

दिल को यह क्या हो गया, कोई शैय भाती नहीं

लूट कर मेरा जहाँ, छुप गए हो तुम कहाँ

एक जाँ और लाख ग़म, घुट के रह जाए न दम

आओ तुम को देख लें, डूबती नज़रों से हम

लूट कर मेरा जहाँ, छुप गए हो तुम कहाँ

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तुम्हें उदास सा पाता हूँ मैं काई दिन से
ना जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम
वो शोख़ियाँ, वो तबस्सुम, वो कहकहे न रहे
हर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुम
छुपा छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनी
ख़ुद अपने राज़ की ताशीर बन गयी हो तुम

मेरी उम्मीद अगर मिट गयी तो मिटने दो
उम्मीद क्या है बस एक पास-ओ-पेश है कुछ भी नहीं
मेरी हयात की ग़मग़ीनियों का ग़म न करो
ग़म हयात-ए-ग़म यक नक़्स है कुछ भी नहीं
तुम अपने हुस्न की रानाईयों पर रहम करो
वफ़ा फ़रेब तुल हवस है कुछ भी नहीं

मुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूं शिकायत हो
मेरी फ़ना मीर एहसास का तक़ाज़ा है
मैं न जानता हूँ के दुनिया का ख़ौफ़ है तुमको
मुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया है
यहाँ हयात के पर्दे में मौत चलती है
शिकस्त साज़ की आवाज़ में रू नग़्मा है

मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं
मेरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुम
ये तुमने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँ
मगर मुझे बता दो कि क्यूँ उदास हो तुम
खफ़ा न हो मेरी जुर्रत-ए-तख़्तब पर
तुम्हें ख़बर है मेरी ज़िंदगी की आस हो तुम

मेरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगा
मगर ख़ुदा के लिये तुम असीर-ए-ग़म न रहो
हुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लिया
यहाँ पर कौन हुआ है किसी का सोचो तो
मुझे क़सम है मेरी दुख भरी जवानी की
मैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो

मैं अपनी रूह की हर एक ख़ुशी मिटा लूँगा
मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकता
मैं ख़ूद को मौत के हाथों में सौँप सकता हूँ
मगर ये बर-ए-मुसाइब उठा नहीं सकता
तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझे
निजात जिनसे मैं एक लहज़ पा नहीं सकता
————————————————————————-

तेरा ख़याल दिल से मिटाया नहीं अभी
बेदर्द मैं ने तुझ को भुलाया नहीं अभी

कल तूने मुस्कुरा के जलाया था ख़ुद जिसे
सीने का वो चराग़ बुझाया नहीं अभी

गदर्न को आज भी तेरे बाहों की याद है
चौखट से तेरी सर को उठाया नहीं अभी
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बेहोश होके जल्द तुझे होश आ गया
मैं बदनसीब होश में आया नहीं अभी

ये ऊँचे ऊँचे मकानों की देवड़ीयों के तले
हर काम पे भूके भिकारीयों की सदा
हर एक घर में अफ़्लास और भूक का शोर
हर एक सिम्त ये इन्सानियत की आह-ओ-बुका
ये करख़ानों में लोहे का शोर-ओ-गुल जिसमें
है दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्मा

तुम न जाने किस जहाँ में खो गए

हम भरी दुनिया में तनहा हो गए

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2 responses to “sahir ludhianavi(સાહિર લુધીયાનવી)

  1. harshita

    ઓગસ્ટ 8, 2010 at 6:35 પી એમ(pm)

    बड़ी ख़ूबसूरत रचनाए है…..

     
  2. harshita

    ઓગસ્ટ 8, 2010 at 6:39 પી એમ(pm)

    तुम्हें उदास सा पाता हूँ मैं काई दिन से
    ना जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम………
    मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं
    मेरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुम
    ये तुमने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँ
    मगर मुझे बता दो कि क्यूँ उदास हो तुम
    खफ़ा न हो मेरी जुर्रत-ए-तख़्तब पर
    तुम्हें ख़बर है मेरी ज़िंदगी की आस हो तुम

    मेरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगा
    मगर ख़ुदा के लिये तुम असीर-ए-ग़म न रहो
    हुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लिया
    यहाँ पर कौन हुआ है किसी का सोचो तो
    मुझे क़सम है मेरी दुख भरी जवानी की
    मैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो

    मैं अपनी रूह की हर एक ख़ुशी मिटा लूँगा
    मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकता
    मैं ख़ूद को मौत के हाथों में सौँप सकता हूँ
    मगर ये बर-ए-मुसाइब उठा नहीं सकता
    तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझे
    निजात जिनसे मैं एक लहज़ पा नहीं सकता
    ——————————————बड़ी ही दिल को छु लेने वाली पंक्तिया है ………
    शुक्रिया नरेशजी…
    …………..

     

પ્રતિસાદ આપો

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