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GALIB…

ये न थि हमारी किस्मत कि विसाले यार होता,
अगर और जीते रहते यही इन्तजार होता,
तेरे वादे पे जिए हम,तो ये जान झुठ जाना,
कि खुशीसे मर न जाते अगर एतबार होता,
कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे-नीमकश को,
ये खलिश कहां से होती जो जिगर के पार होता,
ये कहां की दोस्ती है कि बने है दोस्त नासेह,
कोई चारासाज होता कोई गमगुसार होता,
रगे-संग से टपकता वो लहू कि फिर न थमता,

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न था कुछ, तो खुदा था,खुछ न होता,तो खुदा होता,
डुबाया मुझको होने ने, न होता मै,तो क्या होता
हुई मुद्दत कि ‘गालिब’ मर गया,पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता ।

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नही कि मुझको कयामत का एतकाद नही,
शबे फिराक से रोजे – जजा जियाद नही,
नाला जुज हिश्ने-तलब, ऐ सितम-ईजाद नही,
है तकाजा-ए-जफा ,शिकवए-बेदाद नही,
अहले-बीनश को है,तुफाने-हवादिस,मकतब,
लत्मा-ए-मौज,कम अज सेलि-ए-उस्ताद नही,
मगर गुबार हुए पर,हवा उडा ले जाए,
वगर्ना ताबो-तवा,बालो-पर में खाक नही,

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क्यों जल गया न ताबे-रुखे यार देख कर,
जलता हूं अपनी ताकते-दीदार देख कर
आता है मेरे कत्ल को,पुरजोशे-रश्क से,
मरता हूं उसके हाथ में तलवार देख कर,
वा हसरता कि यार ने खेंचा सितम से हाथ,
हमको हरीसे-लज्जते-आजार देख कर,

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या रब न वो समझे है न समझेंगे मेरी बात,
दे और दिल उनको जो न दे मुझको जुबां और,
हरचन्द सुबुकदस्त हुए बुतशिकनी में
हम है, तो अभी राह में है संगे-गिरां और
पाते नहीं जब राह तो चढ जाते है नाले
रुकती मेरी है तबआ , तो होती है रर्वां और
है और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
कहते है कि ‘गालिब् काहै अंदाजे-बयां और
जाते हुए कहते हो कयामत को मिलेंगे
क्या खूब कयामत का है गोया कोई दिन और

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ईमा मुझे रोके है,जो खेंचे है मुझे कुफ्र
काबा मेरे पीछे है,कलीस मेरे आगे
आशिक हूं,पे माशूक फरेबी है मेरा काम
मजनूं को बुरा कहती है लैला मेरे आगे
खुश होते है,पर वरल में यूं मर नही जाते
आई शबे-हिज्रां की तमन्ना मेरे आगे
गो हाथ को जुंबिश नहीं,आंखों में तो दम है
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे

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हजारों ख्वाहिशे ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमन,लेकिन फिर भी कम निकले
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए है लेकिन
बहुत बेआबरु होकर तेरे कूचे से हम निकले
भरम खुल जाए जालिम तेरे कामत की दराजी का
अगर उस तुर्र-ए-पुरपेचो-खम का पेचो-खम निकले
हुई जिनसे तवक्को खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज्यादा खस्त-ए-तेगे सितम निकले
मुहब्बत में नही है फर्क जीने और मरने का
उसी को देखकर जीते है,जिस काफिर पे दम निकले
कहां मैखाने का दरवाजा ‘ गालिब’ और कहां वाइज
पर इतना जानते है, कल वो जाता था कि हम निकले

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दिले नादां तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है
हम है मुस्ताक और वो बेजार
या इलाही ये माजरा क्या है
मै भी मुण्ह में जुबान रखता हूं
काश पूछो कि मुद्दा क्या है
जब कि तुझ बिन नही कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है
ये परीचेहरा लोग कैसे है
गम्जा-ओ-इश्वा-अदा क्या है
शिकने-जुल्फे-अंबरी क्युं है
निगहे-चश्मे-सुर्मा सा क्या है
हमको उनके वफा की है उम्मीद
जो नही जानते वफा क्या है
जान तुम पर निसार करता हूं
मै नही जानता दुआ क्या है

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गर्चे हूं दीवाना,पर क्यूं दोस्त का खाउं फरेब
आस्तीं में दश्ना पिन्हा,हाथमें नस्तर खुला
है ख्याले-हुस्न में हुस्ने-अमल का सा ख्याल
खुल्द का इक दर है मेरी गोर के अंदर खुला
दर पे रहने को कहा और कह के कैसा फिर गया
जितने अर्से में मेरा लिपटा हुआ बिस्तर खुला

थी नौआमोजे-फना हिम्मते-दिखार-पसन्द
सख्त मुश्किल है कि,यह काम भी आसां निकला.

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जिक्र उस परीवश का,और फिर बयां अपना
बन गया रकीब आखिर,था जो रजदां अपना
मंजर इक बुलंन्दी पर और बना सकते
अर्श से उधर होता काश कि मकां अपना
दर्दे दिल लिखूं कब तक,जाउं उनको दिखला दूं
उंगलिया फिगार अपनी,खामा खूं-चकां अपना
हम कहां के दाना थे किस हुन्नर में यत्का थे
बेसबब हुआ ‘गालिब’ दुश्मन आसमां अपना
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बस कि दुखार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयरसर नही इन्सां होना
की मेरे कत्ल के बाद, उसने जफा से तौबा
हाए उस जुद पर्शमां का पशेमां होना
हैफ उस चार गिरह कपडे की किस्मत ‘गालिब’
जिसकी किस्मत में हो आशिक का गरेंबा होना
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मिलती है खू -ए-यार से नार ,इल्तिहाब में
काफिर हूं, गर न मिलती हो राहत अंजाब में
ता फिर न इन्तजार में नींद आए उम्रभर
आने का अहद कर गए, आए जो ख्वाब में
कासिद के आते आते, खत इक और लिख रखूं
में जानता हूं, जो वो लिखेंगे जवाब में
मुझ तक कब उनकी बज्म में आता था
साकी ने कुछ मिला न दिया शराब में
में मुज्तरिब हूं वस्म में खौफे रकीब से
डाला है तुमको वहम ने किसी पेचो लब में
रौ में है रख्शे-उम्र कहां देखिए थमे
न हाथ बाग पर है, न पा है रकाब में
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दाइम पडा हुआ तेरे दर पर नही हूं में
खाक ऐसी जिन्दगी पे कि पत्थर नही हूं में
क्यूं गर्दिशे-मूदाम से घबरा न जाए दिल
इन्सान हूं, प्याला-ओ-सागर नही हूं में
या रब जमाना मुझको मिटाता है किसलिए?
लौहे-जहां पे हर्फे-मुकर्रर नही हूं में
चलता हूं थोडी दूर हर इक तेज रौ के साथ
पहचानता नही हूं अभी राहबर को में..
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मौत का एक दिन मुअय्यन है
नीद क्यूं रातभर नही आती
आगे आती थी हाले-दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नही आती
है कुछ ऐसी ही बात, जो चुप हूं
वर्ना क्या बात कर नही आती
हम वहां है,जहां से हमको भी
कुछ हमारी खबर नही आती

दिल आपका, कि दिल में है जो कुछ ,सो आपका,
दिल लिजिए, मगर मेरे अरमां निकाल कर

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પ્રતિસાદ આપો

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